7.12.11

तुम

छीन लेते हो तुम


मेरे जीवन से खुशबु


मेरे मन से साहस


मेरी आत्मा से तृप्ति


कर देते हो मुझे वंचित


...बनाते हो अकिंचन


इससे पहल


की मैं मांगू तुमसे


और पीडाएं


और वन्चानाएं....


एक बात पूछू...उत्तर दोगे मुझे,???


मेरा सब कुछ छीन कर भी


तुम हारे हुए से क्यों दीखते हो?


समझ नहीं आता मुझे


अकिंचन मैं हूँ,


या तुम?

3.3.11

रास्ते.....

वक़्त बड़ा निष्ठुर है.....अमीर हो जाता है सबका सबकुछ छीन कर...पार उदास होने से तो काम नहीं चलेगा.रास्ते तो अब भी बुलाते है.मंजिलें अभी भी इंतज़ार कर रही है.चलना तो पड़ेगा ही.ठोकरों से डरकर बैठने वालों में से तो हम भी नहीं है.वक़्त अच्छा ही कब था जो कहे की आज बुरा है.सबकी अपनी ज़िन्दगी है सवारने के लिए,फिर अपनी ज़िन्दगी से इतनी नाइंसाफी क्यों.रास्ते बुला रहे है.....बस कदम बढ़ाना बाकी है.

13.3.09

कमी...

फ़िर हुए कुछ स्वप्न खण्डित,

फ़िर प्रयत्नों की कमी!

मांगती कुछ रौशनी,

पर चाँद भी तो है नहीं!

न बरसती आँख भी,

पर बादलों में है नमी!

भागता सा वक्त है,

पर ज़िन्दगी जैसे थमी!

पा लिया सब कुछ हो जैसे,

फ़िर भी है कोई कमी!

क्या करुँ कैसे बचूं,

ये सिलसिला थमता नहीं!

मांगता रहता है आश्रय,

मन कहीं रमता नहीं!

पर उम्मीदें छोड़ दूँ क्या.....?

इसकी भी क्षमता नहीं....!!!

30.1.09

अर्पण....

मैं अकिंचन
सोचती थी देव को,
क्या करुँ अर्पण....

सिर्फ श्रध्हा,
रख सकी थी चरणों में बस
था यही धन.....

मांगती थी,

ज्ञान से ,शक्ति से भर जाए
ये जीवन....

जानती थी,
देव की मूरत है
मात्र प्रस्तरखंड....

पर जो देखा,
देव की प्रतिमूर्ति है
मेरा ही मन....

मैं क्या देती,
मन मुझे अर्पित करे
अंतिम शरण....

संशय मिटाकर,
देता है बल,कहता है कर
कोई सृजन.....

पथ प्रदर्शक
बन चुका अब देव
मेरा अंतःकरण.....!!

22.11.08

सपने देखने का अपराधबोध...

सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस मे
हर उस क्षण
जब यह प्रक्रिया
प्रतीत होने लगती है
निहायत ही स्वार्थी,आत्मकेंद्रित
और वर्गीय!

सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस मे
जब कक्षा १२ की उस निर्दोष के
दोनों पोलियोग्रस्त पैरों को छूते हुए
मेरे मुह से निकलता है...
"काश! एक पैर भी ठीक होता
तो तकलीफ़ थोडी कम हो जाती"
एक मृत सपने में से जैसे आवाज़ आती है
"मैम ! दोनों पैर ठीक होते तो?"
और रोने लगती है पूरी कक्षा,वो निर्दोष और खामोशी...!

सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस में
जब गली के नुक्कड़ की
'शर्मा स्वीट्स' में मेरे ४ समोसे 'पैक' करते
८ साल के छोटू से ये प्रश्न पूछ बैठती हूँ
"बेटा! स्कूल नहीं जाते हो क्या?"
एक मृत सपने में से जैसे आवाज़ आती है
"अच्छा नही लगता"
और हसने लगते हैं दूकान के बाकी छोटू!

सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस में
जब कचरा बीनते बच्चे
न जाने क्या पाकर चले जाते है एक किनारे
और सिगरेट के एक अधजले टुकड़े को
फिर जलाकर,जली हुई ज़िन्दगी में
धुंआ भरने लगते हैं!
मैं कह देती हूं
"क्यों पीते हो,मरोगे एक दिन!"
एक मृत सपने से जैसे आवाज़ आती है
"जी! मज़ा आवे है!"
और खिलखिला दिए बच्चे,सिगरेट और धुआं!

सपने देखना अपराध नहीं होता
और टूटने, चुभने, जलने, बिखरने से
नहीं मिटते सपने!
पर शहर की भीड़ की
कुछ गुमनाम आँखों में
नहीं पलता एक भी सपना.....
पर मेरे भीतर पलने लगता है
एक अपराधबोध
उस स्वार्थ के लिये
जिसके सारे सवाल '
मेरे सपनों' पर आकर
ठहर जाते हैं
आज की तरह....!

18.11.08

खोज...

जब....

नकारते हैं हम

तथ्यों को,

स्वीकारते हैं हम

भावनाओं को,

पुकारते हैं हम,

अतीत को,

धिक्कारते हैं हम

वर्तमान को....

तो क्या ये चाहत होती है,

या कुंठित इच्छाएं?

अयथार्थ की खोज

यथार्थ के विस्तार में!

अवास्तविक की पहचान,

तथ्यों की गहराई में!

क्या ये छद्म विवेक है,

या साक्षात अहम्?

जिसमे सिर्फ़ छलावा है...

और उस छलावे में॥

सत्य खोजते

'हम' !!!

2.11.08

आस

थक गयी है॥
आस अपनी मंजिलों को खोजते खोजते,
दायरों में घूम कर,
फिर किसी पल ठहर,
सांस लेती सब्र से ...
फिर उठी,
न जाने किसको ढूँढने में...
पक गयी है...........
थक गयी है!!!

29.10.08

ऐसे भी.....

न चाहतें होंगीItalic,न अरमान होंगे,
तो रास्ते शायद आसान होंगे!

न पहचान होगी कोई ज़िन्दगी की,
एहसास पत्थर से बेजान होंगे!

मंजिल को पाके भी ढूंढेंगे मंजिल,
ये आगाज़ होंगे या अंजाम होंगे!

किन-किन की बातों को अपना बनाएं,
हम ही खुद की बातों से अनजान होंगे!

तेरी शख्सियत के ही चर्चे रहेंगे,
हम गुमनाम ही थे,हम गुमनाम होंगे!

बसा लो कोई घर यहीं पर बना कर,
हम तो बस दो दिन के मेहमान होंगे!

न जाने कहाँ फिर मिलोगे हमें तुम,
बुलाना न हमको,हम बेनाम होंगे!

4.10.08

भगवान्..

भगवान् ने हमेशा मेरा विश्वास तोडा.
इसीलिए....
कभी नहीं रही मेरी आस्थाएं
उसके लिए...
एक दिन गलती से
मैंने तुम्हे भी
भगवान् मान लिया था!

26.9.08

चिंतन....

जब भाव नहीं प्रीती कैसी,
जब प्रीती नहीं बंधन कैसा?
बंधन का विषय भी व्यर्थ रहा,
जब विषय नहीं चिंतन कैसा?

क्यों सृजन किया अवशेषों से,
क्यों स्वप्नों का अभिषेक किया?
क्यों स्पर्श किया स्मृतियों को ,
क्यों सत्य-तथ्य को एक किया?
हर अनुभूति निष्प्राण रही ,
जब प्राण नहीं जीवन कैसा?

कितनी श्रद्धा ,कितनी भक्ति,
कितने स्वर,कितनी प्रार्थनाएं,
उन चरणों को अर्पित कर दी,
कितनी पावन आराधनायें!
पर प्रस्तर था,वह मौन रहा,
जब ईश नहीं,वंदन कैसा?

सजल नयनों की धाराएं,
अविरल बह जीवन दान करें!
पल-पल सिंचित कर कामनाएं,
अदृश्य का आह्वान करें!
अब हर्षित मन ,अवसाद नहीं ,
जब व्यथा नहीं क्रंदन कैसा?

क्रंदन का विषय भी व्यर्थ रहा,
जब विषय नहीं,चिंतन कैसा?