मैं अकिंचन
सोचती थी देव को,
क्या करुँ अर्पण....
सिर्फ श्रध्हा,
रख सकी थी चरणों में बस
था यही धन.....
मांगती थी,
ज्ञान से ,शक्ति से भर जाए
ये जीवन....
जानती थी,
देव की मूरत है
मात्र प्रस्तरखंड....
पर जो देखा,
देव की प्रतिमूर्ति है
मेरा ही मन....
मैं क्या देती,
मन मुझे अर्पित करे
अंतिम शरण....
संशय मिटाकर,
देता है बल,कहता है कर
कोई सृजन.....
पथ प्रदर्शक
बन चुका अब देव
मेरा अंतःकरण.....!!
भावनाएं कभी मर सकती हैं भला...... वैसे लोग कोशिश तो बहुत करते हैं.....मुझे जिंदा रहने के लिए इनकी ज़रुरत हैं.....बिलकुल वैसे ही जैसे मुझे साँसों की ज़रुरत है.....अगर कविता माध्यम बन जाये इनकी अभिव्यक्ति का......तो ये कोई प्रयास नहीं.....बल्कि सहज और सरल अभिव्यक्ति है...!
30.1.09
22.11.08
सपने देखने का अपराधबोध...
सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस मे
हर उस क्षण
जब यह प्रक्रिया
प्रतीत होने लगती है
निहायत ही स्वार्थी,आत्मकेंद्रित
और वर्गीय!
सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस मे
जब कक्षा १२ की उस निर्दोष के
दोनों पोलियोग्रस्त पैरों को छूते हुए
मेरे मुह से निकलता है...
"काश! एक पैर भी ठीक होता
तो तकलीफ़ थोडी कम हो जाती"
एक मृत सपने में से जैसे आवाज़ आती है
"मैम ! दोनों पैर ठीक होते तो?"
और रोने लगती है पूरी कक्षा,वो निर्दोष और खामोशी...!
सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस में
जब गली के नुक्कड़ की
'शर्मा स्वीट्स' में मेरे ४ समोसे 'पैक' करते
८ साल के छोटू से ये प्रश्न पूछ बैठती हूँ
"बेटा! स्कूल नहीं जाते हो क्या?"
एक मृत सपने में से जैसे आवाज़ आती है
"अच्छा नही लगता"
और हसने लगते हैं दूकान के बाकी छोटू!
सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस में
जब कचरा बीनते बच्चे
न जाने क्या पाकर चले जाते है एक किनारे
और सिगरेट के एक अधजले टुकड़े को
फिर जलाकर,जली हुई ज़िन्दगी में
धुंआ भरने लगते हैं!
मैं कह देती हूं
"क्यों पीते हो,मरोगे एक दिन!"
एक मृत सपने से जैसे आवाज़ आती है
"जी! मज़ा आवे है!"
और खिलखिला दिए बच्चे,सिगरेट और धुआं!
सपने देखना अपराध नहीं होता
और टूटने, चुभने, जलने, बिखरने से
नहीं मिटते सपने!
पर शहर की भीड़ की
कुछ गुमनाम आँखों में
नहीं पलता एक भी सपना.....
पर मेरे भीतर पलने लगता है
एक अपराधबोध
उस स्वार्थ के लिये
जिसके सारे सवाल '
मेरे सपनों' पर आकर
ठहर जाते हैं
आज की तरह....!
पनपने लगता है अंतस मे
हर उस क्षण
जब यह प्रक्रिया
प्रतीत होने लगती है
निहायत ही स्वार्थी,आत्मकेंद्रित
और वर्गीय!
सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस मे
जब कक्षा १२ की उस निर्दोष के
दोनों पोलियोग्रस्त पैरों को छूते हुए
मेरे मुह से निकलता है...
"काश! एक पैर भी ठीक होता
तो तकलीफ़ थोडी कम हो जाती"
एक मृत सपने में से जैसे आवाज़ आती है
"मैम ! दोनों पैर ठीक होते तो?"
और रोने लगती है पूरी कक्षा,वो निर्दोष और खामोशी...!
सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस में
जब गली के नुक्कड़ की
'शर्मा स्वीट्स' में मेरे ४ समोसे 'पैक' करते
८ साल के छोटू से ये प्रश्न पूछ बैठती हूँ
"बेटा! स्कूल नहीं जाते हो क्या?"
एक मृत सपने में से जैसे आवाज़ आती है
"अच्छा नही लगता"
और हसने लगते हैं दूकान के बाकी छोटू!
सपने देखने का अपराधबोध
पनपने लगता है अंतस में
जब कचरा बीनते बच्चे
न जाने क्या पाकर चले जाते है एक किनारे
और सिगरेट के एक अधजले टुकड़े को
फिर जलाकर,जली हुई ज़िन्दगी में
धुंआ भरने लगते हैं!
मैं कह देती हूं
"क्यों पीते हो,मरोगे एक दिन!"
एक मृत सपने से जैसे आवाज़ आती है
"जी! मज़ा आवे है!"
और खिलखिला दिए बच्चे,सिगरेट और धुआं!
सपने देखना अपराध नहीं होता
और टूटने, चुभने, जलने, बिखरने से
नहीं मिटते सपने!
पर शहर की भीड़ की
कुछ गुमनाम आँखों में
नहीं पलता एक भी सपना.....
पर मेरे भीतर पलने लगता है
एक अपराधबोध
उस स्वार्थ के लिये
जिसके सारे सवाल '
मेरे सपनों' पर आकर
ठहर जाते हैं
आज की तरह....!
18.11.08
खोज...
जब....
नकारते हैं हम
तथ्यों को,
स्वीकारते हैं हम
भावनाओं को,
पुकारते हैं हम,
अतीत को,
धिक्कारते हैं हम
वर्तमान को....
तो क्या ये चाहत होती है,
या कुंठित इच्छाएं?
अयथार्थ की खोज
यथार्थ के विस्तार में!
अवास्तविक की पहचान,
तथ्यों की गहराई में!
क्या ये छद्म विवेक है,
या साक्षात अहम्?
जिसमे सिर्फ़ छलावा है...
और उस छलावे में॥
सत्य खोजते
'हम' !!!
2.11.08
आस
थक गयी है॥
आस अपनी मंजिलों को खोजते खोजते,
दायरों में घूम कर,
फिर किसी पल ठहर,
सांस लेती सब्र से ...
फिर उठी,
न जाने किसको ढूँढने में...
पक गयी है...........
थक गयी है!!!
आस अपनी मंजिलों को खोजते खोजते,
दायरों में घूम कर,
फिर किसी पल ठहर,
सांस लेती सब्र से ...
फिर उठी,
न जाने किसको ढूँढने में...
पक गयी है...........
थक गयी है!!!
29.10.08
ऐसे भी.....
न चाहतें होंगी
,न अरमान होंगे,
तो रास्ते शायद आसान होंगे!
न पहचान होगी कोई ज़िन्दगी की,
एहसास पत्थर से बेजान होंगे!
मंजिल को पाके भी ढूंढेंगे मंजिल,
ये आगाज़ होंगे या अंजाम होंगे!
किन-किन की बातों को अपना बनाएं,
हम ही खुद की बातों से अनजान होंगे!
तेरी शख्सियत के ही चर्चे रहेंगे,
हम गुमनाम ही थे,हम गुमनाम होंगे!
बसा लो कोई घर यहीं पर बना कर,
हम तो बस दो दिन के मेहमान होंगे!
न जाने कहाँ फिर मिलोगे हमें तुम,
बुलाना न हमको,हम बेनाम होंगे!
,न अरमान होंगे,तो रास्ते शायद आसान होंगे!
न पहचान होगी कोई ज़िन्दगी की,
एहसास पत्थर से बेजान होंगे!
मंजिल को पाके भी ढूंढेंगे मंजिल,
ये आगाज़ होंगे या अंजाम होंगे!
किन-किन की बातों को अपना बनाएं,
हम ही खुद की बातों से अनजान होंगे!
तेरी शख्सियत के ही चर्चे रहेंगे,
हम गुमनाम ही थे,हम गुमनाम होंगे!
बसा लो कोई घर यहीं पर बना कर,
हम तो बस दो दिन के मेहमान होंगे!
न जाने कहाँ फिर मिलोगे हमें तुम,
बुलाना न हमको,हम बेनाम होंगे!
4.10.08
भगवान्..
भगवान् ने हमेशा मेरा विश्वास तोडा.
इसीलिए....
कभी नहीं रही मेरी आस्थाएं
उसके लिए...
एक दिन गलती से
मैंने तुम्हे भी
भगवान् मान लिया था!
इसीलिए....
कभी नहीं रही मेरी आस्थाएं
उसके लिए...
एक दिन गलती से
मैंने तुम्हे भी
भगवान् मान लिया था!
26.9.08
चिंतन....
जब भाव नहीं प्रीती कैसी,
जब प्रीती नहीं बंधन कैसा?
बंधन का विषय भी व्यर्थ रहा,
जब विषय नहीं चिंतन कैसा?
क्यों सृजन किया अवशेषों से,
क्यों स्वप्नों का अभिषेक किया?
क्यों स्पर्श किया स्मृतियों को ,
क्यों सत्य-तथ्य को एक किया?
हर अनुभूति निष्प्राण रही ,
जब प्राण नहीं जीवन कैसा?
कितनी श्रद्धा ,कितनी भक्ति,
कितने स्वर,कितनी प्रार्थनाएं,
उन चरणों को अर्पित कर दी,
कितनी पावन आराधनायें!
पर प्रस्तर था,वह मौन रहा,
जब ईश नहीं,वंदन कैसा?
सजल नयनों की धाराएं,
अविरल बह जीवन दान करें!
पल-पल सिंचित कर कामनाएं,
अदृश्य का आह्वान करें!
अब हर्षित मन ,अवसाद नहीं ,
जब व्यथा नहीं क्रंदन कैसा?
क्रंदन का विषय भी व्यर्थ रहा,
जब विषय नहीं,चिंतन कैसा?
जब प्रीती नहीं बंधन कैसा?
बंधन का विषय भी व्यर्थ रहा,
जब विषय नहीं चिंतन कैसा?
क्यों सृजन किया अवशेषों से,
क्यों स्वप्नों का अभिषेक किया?
क्यों स्पर्श किया स्मृतियों को ,
क्यों सत्य-तथ्य को एक किया?
हर अनुभूति निष्प्राण रही ,
जब प्राण नहीं जीवन कैसा?
कितनी श्रद्धा ,कितनी भक्ति,
कितने स्वर,कितनी प्रार्थनाएं,
उन चरणों को अर्पित कर दी,
कितनी पावन आराधनायें!
पर प्रस्तर था,वह मौन रहा,
जब ईश नहीं,वंदन कैसा?
सजल नयनों की धाराएं,
अविरल बह जीवन दान करें!
पल-पल सिंचित कर कामनाएं,
अदृश्य का आह्वान करें!
अब हर्षित मन ,अवसाद नहीं ,
जब व्यथा नहीं क्रंदन कैसा?
क्रंदन का विषय भी व्यर्थ रहा,
जब विषय नहीं,चिंतन कैसा?
12.9.08
मुक़द्दर......
हाँ, मुझे भी याद है वो काफिला और वो सफर,
सब चले हमको मगर रस्ता नज़र आया नहीं।
हाँ,बड़ी गहराई तेरी बात में हमको लगी,
डूबती खामोशियों को कोई सुन पाया नहीं।
हाँ,भरोसा था मगर इक लाश से ज़्यादा न था,
साँसे भी ले लीं मेरीऔर वो भी जी पाया नहीं।
हाँ ,मुझे एहसास था तेरी चुभन का दर्द का,
कांच मेरी रूह में था देख तू पाया नहीं।
हाँ, मुझे मालूम है वो सुनता है पर देर से,
खटखटाने दर किसी के घर खुदा आया नहीं।
हाँ,मुकद्दर से लडाई चल रही है आज तक,
हारना मुझको न आया, जीत वो पाया नहीं।
सब चले हमको मगर रस्ता नज़र आया नहीं।
हाँ,बड़ी गहराई तेरी बात में हमको लगी,
डूबती खामोशियों को कोई सुन पाया नहीं।
हाँ,भरोसा था मगर इक लाश से ज़्यादा न था,
साँसे भी ले लीं मेरीऔर वो भी जी पाया नहीं।
हाँ ,मुझे एहसास था तेरी चुभन का दर्द का,
कांच मेरी रूह में था देख तू पाया नहीं।
हाँ, मुझे मालूम है वो सुनता है पर देर से,
खटखटाने दर किसी के घर खुदा आया नहीं।
हाँ,मुकद्दर से लडाई चल रही है आज तक,
हारना मुझको न आया, जीत वो पाया नहीं।
6.9.08
माँ......
माँ....
तुम्हारा हर स्वर याद आता है,
तरसते हैं हाथ तुम्हारे स्पर्श को
और यादों से दिल भर आता है!
हर क्षण में कितना अपनापन
भर देती थी तुम,
और जीवन का सारा सूनापन
हर लेती थी तुम!
अक्षत और कुमकुम से
लगा देती थी माथे पे
गोल गोल टीका,
सैकड़ों दुआएं मांग लेती थी
एक ही पल में.....
सारे दुःख दर्द छिपा लेती थी
अपने आँचल में,
कितने सपने दिखला देती थी
धुंधले कल में...!
याद है मुझे...
कैसे विचलित कर देते थे तुम्हे
छोटे मोटे ज़ख्म
मेरे इस तन के...
आज कैसे दिखाऊँ
रिसते हुए घाव....
इस मन के,
जीवन के.........!
न जाने क्या था
इस लाल धागे के रिश्ते में...
कि दुनिया भर की जंजीरे तोड़कर,
फ़िर इसी में बंधने का दिल करता है!
बाँध लो न फ़िर से मुझको,
कि कहीं बिखर के
खो न जाऊँ मैं...
भावनाओं से रहित
इस पथरीली दुनिया में,
कहीं पत्थर
हो न जाऊं मैं!
बुला लो मुझे अपने पास....
कि शायद फ़िर जी लें....
मेरे एहसास....!
मन पर लगी
सारी दुनियादारी की मैल ,
धो लेने दो...
आज फ़िर
अपनी गोद में सर रखकर
आँचल से ढककर
रो लेने दो......
जी भर के......!!!
तुम्हारा हर स्वर याद आता है,
तरसते हैं हाथ तुम्हारे स्पर्श को
और यादों से दिल भर आता है!
हर क्षण में कितना अपनापन
भर देती थी तुम,
और जीवन का सारा सूनापन
हर लेती थी तुम!
अक्षत और कुमकुम से
लगा देती थी माथे पे
गोल गोल टीका,
सैकड़ों दुआएं मांग लेती थी
एक ही पल में.....
सारे दुःख दर्द छिपा लेती थी
अपने आँचल में,
कितने सपने दिखला देती थी
धुंधले कल में...!
याद है मुझे...
कैसे विचलित कर देते थे तुम्हे
छोटे मोटे ज़ख्म
मेरे इस तन के...
आज कैसे दिखाऊँ
रिसते हुए घाव....
इस मन के,
जीवन के.........!
न जाने क्या था
इस लाल धागे के रिश्ते में...
कि दुनिया भर की जंजीरे तोड़कर,
फ़िर इसी में बंधने का दिल करता है!
बाँध लो न फ़िर से मुझको,
कि कहीं बिखर के
खो न जाऊँ मैं...
भावनाओं से रहित
इस पथरीली दुनिया में,
कहीं पत्थर
हो न जाऊं मैं!
बुला लो मुझे अपने पास....
कि शायद फ़िर जी लें....
मेरे एहसास....!
मन पर लगी
सारी दुनियादारी की मैल ,
धो लेने दो...
आज फ़िर
अपनी गोद में सर रखकर
आँचल से ढककर
रो लेने दो......
जी भर के......!!!
29.8.08
भावना के लिए....
खाली लफ्जों से भला बात बना करती है?
भले ही जान ले दुनिया हमारा हाल-ऐ-दिल,
हमारे अश्कों से कोई बेखबर तो होता है...
साथ हो सकता है बेशक ज़िन्दगी भर के लिए,
साँस टूट जाने का थोड़ा सा डर तो होता है...
राहों की मुश्किलों से कौन डरता है,
साथ सबके ही कोई हमसफ़र तो होता है...
हरेक शाम विदा कहते हैं सब लोग उनका,
अपना कहने के लिए एक घर तो होता है...
जीते-जीते भला क्यों मरने लगी है भावना,
बेरुखी में भी एक धीमा ज़हर तो होता है...!!!
बात में कोई न कोई असर तो होता है...
भले ही जान ले दुनिया हमारा हाल-ऐ-दिल,
हमारे अश्कों से कोई बेखबर तो होता है...
साथ हो सकता है बेशक ज़िन्दगी भर के लिए,
साँस टूट जाने का थोड़ा सा डर तो होता है...
राहों की मुश्किलों से कौन डरता है,
साथ सबके ही कोई हमसफ़र तो होता है...
हरेक शाम विदा कहते हैं सब लोग उनका,
अपना कहने के लिए एक घर तो होता है...
जीते-जीते भला क्यों मरने लगी है भावना,
बेरुखी में भी एक धीमा ज़हर तो होता है...!!!
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